अल्ताफ खान धार।
प्रेम, विश्वास और आस्था के संगम का पर्व करवा चौथ पूरे हर्ष और उल्लास के साथ मनाया गया। नगर में सुबह से ही सुहागिन महिलाओं के चेहरे पर व्रत की पवित्र चमक और पति के प्रति समर्पण की झलक साफ़ दिखाई दे रही थी। हर स्त्री ने अपने जीवनसाथी की लंबी उम्र, अच्छे स्वास्थ्य और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना के लिए निर्जला व्रत रखकर अपनी अटूट निष्ठा का परिचय दिया।
करवा चौथ से एक दिन पहले ही महिलाओं ने मेहंदी से अपने हाथों को रचा लिया था। किसी ने पति का नाम मेहंदी की लकीरों में सजाया तो किसी ने अपने प्रेम को रंगों में पिरोया। शाम होते ही नगर की गलियाँ सजी-धजी सुहागिनों से जगमगा उठीं। लाल, गुलाबी, सुनहरी साड़ियों में सजी महिलाएं सोलह श्रृंगार कर अपने जीवनसाथी के लिए व्रत खोलने की तैयारी में मग्न थीं।
शाम ढलते ही हर घर की छतों पर चाँद का बेसब्री से इंतजार होने लगा। महिलाएं पूजा की थाली में दीपक, करवा और छलनी सजाकर आसमान की ओर निहारती रहीं। बच्चे भी बार-बार छत पर जाकर चाँद के आने की खबर देने को उत्सुक थे।
रात करीब नौ बजे जब आसमान में चाँद ने अपनी रौशनी बिखेरी तो सुहागिनों के चेहरों पर मुस्कान खिल उठी। विधि-विधान से पूजा कर महिलाओं ने छलनी से चाँद का दीदार किया और फिर उसी छलनी से अपने पति का चेहरा देखा — मानो चाँद और प्रेम दोनों एक साथ झिलमिला उठे हों।
पति के हाथों से जल ग्रहण कर महिलाओं ने अपने व्रत का समापन किया और उनके चरण स्पर्श कर लंबी उम्र का आशीर्वाद मांगा। पति ने भी प्यार भरे स्नेह से पत्नी को आशीर्वाद देते हुए जल पिलाया। इसके बाद दोनों ने साथ बैठकर प्रेमपूर्वक भोजन ग्रहण किया — जैसे यह पर्व न केवल व्रत का, बल्कि जीवनभर के साथ का प्रतीक बन गया हो।


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