पति-पत्नी के रिश्तों में आई खटास पर न्यायालय की समझाइश रंग लाई


“लोक अदालत ने न केवल न्याय दिया, बल्कि रिश्तों को भी बचा लिया।”


“सात साल की दूरी मिटाकर फिर से जुड़ा परिवार, बच्चों के चेहरे पर लौटी मुस्कान।”


सात साल बाद बिखरता परिवार फिर जुड़ा, बच्चों के चेहरे पर लौटी मुस्कान।


रिपोर्टर,अल्ताफ खान धार। 

लोक अदालत ने एक बार फिर बिखरते परिवार को टूटने से बचाने में अहम भूमिका निभाई। कुटुंब न्यायालय धार में शनिवार को प्रधान जिला एवं सत्र न्यायाधीश की समझाइश से सात वर्षों से अलग रह रहे दंपति ने आपसी सुलह कर साथ रहने का निर्णय लिया। इस फैसले से परिवार में नई शुरुआत की किरण जगमगा उठी।


मामला : 2015 में हुआ विवाह, 2018 से अदालत में चल रही थी कार्यवाही

पीथमपुर निवासी सुयश शर्मा का विवाह वर्ष 2015 में मोना (निवासी नीवी थाना मऊ, जिला चित्रकूट) से हिंदू रीति-रिवाज से हुआ था। दंपति के दो बच्चे—एक पुत्र और एक पुत्री हैं। विवाह के कुछ वर्षों बाद आपसी मनमुटाव के कारण दोनों अलग हो गए।
2018 में पत्नी ने भरण-पोषण के लिए कुटुंब न्यायालय में वाद दायर किया, जो बाद में उच्च न्यायालय तक भी पहुंचा।


न्यायालय की पहल : सुलहकर्ताओं और जजों ने दी समझाइश

आवेदक सुयश ने अदालत से पत्नी को साथ ले जाकर दाम्पत्य जीवन पुनः शुरू करने की गुहार लगाई।
लोक अदालत में दोनों पक्षों के अधिवक्ताओं एवं सुलहकर्ताओं ने पति-पत्नी को आपसी समझाइश दी। न्यायाधीशों की प्रेरणा से दोनों ने एक-दूसरे को माला पहनाकर साथ रहने का संकल्प लिया।


बच्चों के चेहरे पर लौटी मुस्कान।


सात साल से माता-पिता के बिछोह का दर्द झेल रहे बच्चों के चेहरे इस सुलह के बाद खिल उठे। परिवार अब हंसी-खुशी एक साथ रहने का वादा कर अपने आशियाने की ओर लौट गया।


लोक अदालत की मिसाल

यह मामला एक बार फिर साबित करता है कि लोक अदालत केवल न्याय का माध्यम ही नहीं, बल्कि टूटते रिश्तों को जोड़ने और समाज में सौहार्द कायम करने का भी सशक्त जरिया है।


👉 न्यूज एडिटर जावेद खान 9424860555


ख़बर पर आपकी राय